वाराणसी  शहर का नाम आज दुनियाभर में प्रशिद्ध है। इसके के कई कारण है जैसे की यह हमारे देश की आध्यात्मिक राजधानी है, दूसरा यहाँ पर प्रशिद्ध कशी विश्वनाथ जी का मंदिर है, तीसरा यहाँ पर गंगा नदी के किनारे पर बने हुए घाट जो विश्वप्रसिद्ध हैं, चौथा यहाँ का इतिहास और अंत में यह हमारे देश भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का संसदीय क्षेत्र भी है। वाराणसी में समस्त भारत भर के साथ-साथ विश्व भर से भी बहुत से तीर्थयात्री, पर्यटक, दर्शक, लेखक व कवि यहाँ आते हैं और यहाँ आकर बस यही के बन कर रह जाते हैं। मुझे भी मौका मिला ऐसी अद्भुत जगह पर जाने का।
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अस्सी घाट (वाराणसी)

वाराणसी की यात्रा (A Trip To Varanasi)

जो घूमने का शौक़ीन होता है उसको घूमने के लिए बस कोई बहाना चाहिए ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी है। मैं पेशे से एक डेंटिस्ट हूँ और यह मेरे लिए घूमने में भी मदद करता है अभी हाल ही में मैं और मेरे एक मित्र का वाराणसी जाने का प्लान बना। यह प्लान मेरे लिए बहुत ही हर्षित करने वाला था। हम लोग दिल्ली के पास हाथरस में रहते हैं इसलिए हमलोगों ने अपनी ट्रैन के रिजर्वेशन अलीगढ से कराये हालाँकि हम लोगों का रिजर्वेशन अलीगढ से मुग़लसराय स्टेशन तक का हुआ और वही से वापस आने के लिए हमको सीट मिली। हम लोगों की ट्रेन सुबह 08:15 पर अलीगढ जंक्शन से नंदन कानन एक्सप्रेस थी जो नियत समय पर स्टेशन पहुंच गयी। ट्रेन का मुग़लसराय जंक्शन पहुंचने का समय शाम 06:00 का था लेकिन ट्रैन अपने नियत समय से 2 घंटा देरी से मुग़लसराय जंक्शन पहुंची। 10 घंटे के सफर को हम लोगों ने बहुत एन्जॉय किया। लोगों से बात करते हुए, उनके जाने की जगह के बारे में जानकर, गाने सुनते हुए, खाते-पीते हुए कब ये सफर कट गया पता ही नहीं चला।
वाराणसी-का-घाट
वाराणसी का घाट
मुग़लसराय स्टेशन पहुंच कर हम लोगों ने एक ऑटो बुक किया और अपने डेस्टिनेशन वाराणसी की ओर बढ़ गए। सफर को बजट में रखने के लिए हम लोगों ने जहाँ हो सका पैसे कम करने में नहीं चुके जैसे की ऑटो वाला मुग़लसराय से वाराणसी के दशाश्वमेघ घाट तक जाने के 500 रुपये मांग रहा था जो बहुत अधिक था जिसको हमने मात्रा 250 रूपये में बुक किया। हम लोगों ने पहले से अपने रुकने के लिए ऑनलाइन रूम बुक किआ हुआ था जो दशाश्वमेघ घाट के बहुत नजदीक था। रूम पर पहुंचने के बाद हम लोगों ने आराम किआ और खाना खाने के बाद सो गए। दिन भर की थकन के बाद जब हम लोग 9 बजे के आस पास रूम पहुंचे तो हमने सुबह जल्दी उठाकर ही घूमना ज्यादा बेहतर समझा।
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दशाश्वमेघ घाट (वाराणसी)
सुबह के 6 बजे हम लोग जग चुके थे और जल्दी से तैयार होने लगे। तैयार होने के बाद हम लोग काशी विश्वनाथ भगवान के दर्शन के लिए निकले। मंदिर हमारे रूम से वाकिंग डिस्टेंस पर ही था। हम लोगो को मंदिर पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। दर्शन करने के लिए सभी प्रवेश द्वारों पर श्रद्धालुओं की बहुत लम्बी लाइन लगी हुई थी। और हम भी एक लाइन में लग गए।

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काशी विश्वनाथ मंदिर प्रवेश द्वार 
 श्रद्धालुओं की भीड़ इतनी थी की लगभग 3 घंटे के लम्बे इंतज़ार के बाद हम लोगो को मंदिर के अंदर प्रवेश करने का मौका मिला। ३ घंटे के समय में श्रद्धालुओं के दर्शन के उत्साह को देख कर समय का पता ही नहीं चला। मैं पहले भी एक बार काशी विश्वनाथ बाबा के दर्शन कर चुका हूँ। लेकिन मैं फिर भी बहुत उत्सुक था। लम्बे समय के इंतज़ार के बाद काशी विश्वनाथ के दर्शन का मौका मिला जिसने मुझे अत्यंत आत्मीय सुख दिया।
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अस्सी घाट (वाराणसी)
दर्शन के बाद हम लोग अपने प्रॉफेशन के कार्य से वाराणसी के IMA भवन पहुंचे और अपना कार्य करने के बाद हमने वाराणसी घूमने का प्लान किआ और सबसे पहले हम लोग अस्सी घाट गए। गंगा नदी के शांत किनारे पर बना वाराणसी के प्रमुख घाटों में से एक अस्सी घाट अपने अनोखे अंदाज के लिए प्रशिद्ध है। रंगमंच से जुड़े लोगों के कार्यक्रम, साधुओं की भीड़ और विदेशी पर्यटकों की आवाजाही ने हमारा मन मोह लिया।

अस्सी-घाट-वाराणसी
अस्सी घाट (वाराणसी)
शाम का कुछ समय अस्सी घाट घाट पर गुजारने के बाद हमें भूख लगने लगी तो हम लोग लंका चौराहा जो की वाराणसी का बहुत ही प्रशिद्ध चौराहा है की और चल दिए। लंका चौराहा पहुंचने के बाद हमने वहां गोलगप्पे और लस्सी का आनंद लिया।
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अस्सी घाट (वाराणसी)
 लंका चौराहा पर स्थित है पहलवान लस्सी वाला जिसकी लस्सी पूरे वाराणसी में बहुत प्रशिद्ध है। जब भी आप वाराणसी जाएँ तो वहां की लस्सी का आनंद जरूर लें और ध्यान रखें लंका चौराहा पर पहलवान लस्सी के नाम से कई दुकानें हैं। लेकिन मुख्य दुकान मैन रोड पर अकेली दूकान है जबकि बाकि दुकानें एक साथ हैं। जब आप वाराणसी जायें तो वहां के बनारसी पान का लुफ्त भी जरूर उठायें।
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पहलवान लस्सी वाला (वाराणसी)
शाम के नास्ते के बाद हम लोग ने अपना रुख किया दशाश्वमेघ घाट की ओर और लंका चौराहे से सीधा पहुंचे गंगा आरती के दर्शन के लिए दशाश्वमेघ घाट। घाट पर जमघट देख कर ही अंदाजा हो गया था की गंगा आरती दर्शन के लिए कितने लोग दशाश्वमेघ घाट पर रोजाना आते होंगे। आने वाले लोगों में भारत के प्रत्येक हिस्से से दार्शनिक इकठ्ठा हुए थे साथ ही साथ विदेशों से भी बहुत बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचे थे।
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 दशाश्वमेघ घाट (वाराणसी)
गंगा आरती दर्शन के लिए व्यवस्थापकों ने बहुत ही सूंदर व्यवस्था की हुई थी। पर्यटकों के बैठने के लिए आरती स्थान के पीछे कुर्सियां डाली गयी थे साथ ही सीढ़ियों पर भी दर्शक और सभी भक्त बैठे हुए थे। साथ ही साथ घाट के किनारे पर गंगा नदी में नावों पर भी आगंतुकों के बैठने की व्यवस्था की गयी थी।

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 दशाश्वमेघ घाट (वाराणसी)
जहाँ एक ओर आरती की तैयारियां चल रही थीं वहीँ दूसरी ओर आरती स्थल का पास ही एक चबूतरे पर कुछ कार्यक्रम और चल रहे थे जिसमे बच्चों और बड़ों के द्वारा समाज को सन्देश दिए जा रहे थे। ठीक शाम ७ बजे आरती शुरू हुई और ८ बजे तक चली। ७ ब्राह्मण पंडितों द्वारा गंगा जी की आरती सम्पन्न की गयी। आरती का दृश्य बहुत ही सुन्दर था जो अपने में ही अलौकिक प्रतीत हो रहा था।
रंगमंच कार्यक्रम
आरती दर्शन के बाद हम लोग दशाश्वमेघ घाट से रात्रि भोज के लिए रेस्ट्रॉन्ट गए और वहां से वापस लौटने के लिए मुग़लसराय स्टेशन की ओर बढे। रात 10 बजे की ट्रेन से हमें वापस लौटना था जो की ३ घंटे देरी से स्टेशन पहुंची। देर रात ट्रेन पकड़ने के बाद हम लोग थकान में सो गए। सुबह उठे तो पता चला की ट्रैन ४ घंटे देरी से अलीगढ पहुंचने वाली थी। करीब १ बजे दोपहर को हम अलीगढ पहुंचने के बाद घर पहुंचे.
इस सफर में वाराणसी में सबसे देखने योग्य बात जो थी वो थी वहां के घाटों पर सफाई। इसके लिए मैं धन्यवाद दूंगा वाराणसी की जनता को और सरकार को जिन्होंने वाराणसी को इतना सूंदर बनाया हुआ है।
आगे ऐसे ही यात्रा वृत्रांतो को पढ़ने के लिए साथ बने रहिये। धन्यवाद।



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