बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) के तीन दिन का सफर पूरा हो चुका था और अभी बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) के दर्शन कर लिए थे। हम लोग अपने प्लान के हिसाब से बिलकुल सही चल रहे थे। आ गया था हमारे बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) का चौथा दिन और अब हम लोगों ने अपने सफर में थोड़ा सा परिवर्तन किया। जोशीमठ (Joshimath) आने के बाद ही हमको औली (Auli) का पता चला की औली (Auli) जोशीमठ (Joshimath) से आसानी से पंहुचा जा सकता है इसलिए औली (Auli) भी हमारी लिस्ट में जुड़ गया था। सुबह होते ही हम लोगों ने अपना सफर शुरू किया।

तुंगनाथ महादेव मंदिर, Tungnath Mahadev Temple
तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple)

बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा के 8 दिन (भाग 2) (औली और तुंगनाथ महादेव मंदिर की यात्रा) Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra (Part- 2) (Auli And Tungnath mahadev Temple Trek)

  • 02 मई - हाथरस (Hathras) से हरिद्वार (Haridwar) वाया मेरठ (Meerut)।
  • 03 मई - हरिद्वार (Haridwar) से जोशीमठ (Joshimath) वाया श्रीनगर (Srinagar)।
  • 04 मई - जोशीमठ (Joshimath) से बद्रीनाथ (Badrinath Dham), बद्रीनाथ दर्शन, माना गांव, और बद्रीनाथ से जोशीमठ (Joshimath)।
  • 05 मई - जोशीमठ (Joshimath) से औली (Auli), औली भ्रमण और औली से चोपता (Chopta)।
  • 06 मई - चोपता (Chopta) से तुंगनाथ महादेव (Tungnath Mahadev) ट्रेक और वापसी तथा चोपता (Chopta) से सीतापुर (Sitapur)।
  • 07 मई - सीतापुर (Sitapur) से केदारनाथ(Kedarnath Dham) यात्रा।
  • 08 मई - केदारनाथ(Kedarnath Dham) दर्शन, केदारनाथ से सीतापुर और सीतापुर से रूद्र प्रयाग (Rudraprayag)।
  • 09 मई - रुद्रप्रयाग (Rudraprayag) से हाथरस वाया ऋषिकेश ,हरिद्वार, मेरठ। 

यात्रा का चौथा दिन (05 मई) ( रोप-वे (Rope-Way) द्वारा जोशीमठ (Joshimath) से औली (Auli), औली भ्रमण और औली से चोपता (Chopta))-

सुबह जल्दी उठने के बाद हम लोगों का अगला पड़ाव था औली। औली (Auli) बहुत ही सुंदर जगह है। औली (Auli) जाने के लिए हम लोगों ने रोप वे (Rope-Way) का रास्ता चुना यह हम लोगों के लिए एक नया अनुभव था।

रोपवे, Rope-Way
रोपवे (Rope-Way)
रोपवे (Rope-Way) के जरिए हम लोग औली (Auli) पहुंचे। औली (Auli) में हम लोगों ने काफी अच्छा समय व्यतीत किया हालांकि उस समय वहां बर्फबारी नहीं थी लेकिन अगर आप बर्फबारी का आनंद उठाना चाहते हैं तो सर्दियों के मौसम में औली जा सकते हैं। सर्दियों के समय में देश विदेश से सैलानी यहाँ बर्फ़बारी और स्केटिंग का लुफ्त उठाने के लिए आते हैं।

रोपवे, Rope-Way
रोपवे (Rope-Way)
हम लोगों ने औली में ज्यादा समय ना बिता कर जल्दी निकलना सही समझा क्योंकि हमारा सफर बहुत बाकी था और अब हमारा अगला पड़ाव था तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) इसलिए हम लोग जल्दी वापस आए और तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) के लिए निकल पड़े।

औली (Auli)
क्यूंकि हम लोगों ने अपना रूम औली जाने से पहले ही छोड़ दिया था और अपनी कार को रोप वे की पार्किंग में ही खड़ा कर दिया था इसलिए रोप वे द्वारा वापस जोशीमठ लौटने के बाद हम लोग कार में बैठ कर निकल लिए अपने अगले पड़ाव तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) के लिए। यहाँ आपको बता दूँ की आप अपने वाहन से तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) के लिए केवल चोपता (Chopta) तक ही जा सकते हैं। चोपता (Chopta) में आपको अपना वाहन पार्क करने के बाद लगभग 3 से 3.5 किलोमीटर का ट्रेक करना पड़ता है जो सीधे तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) तक जाता है।

चोपता, Chopta
चोपता (Chopta)
यह ट्रेक से लगभग 1 किलोमीटर आगे चंद्रशिला (Chandrashila ) तक जाता है जहाँ आप आसानी से जा सकते हैं। ट्रेक का रास्ता बहुत सीधा सा है जिसके लिए आपको गाइड की भी खास जरुरत नहीं है। यहीं आपको एक और बताना चाहूंगा की तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) सबसे अधिक ऊंचाई पर बना शिव मंदिर है जो तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) की महत्ता को और बढ़ता है। इसके अलावा तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) का एक अलग ही पौराणिक महत्व भी है। कहा जाता है की जब महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडवों ने स्वर्ग की और अपनी यात्रा शुरू की तब रास्ते में पांडवों ने भगवन शिव की प्रार्थना की जो उनसे महाभारत ने हुए नरसंहार की वजह से नाराज थे। तब महादेव ने बैल का रूप (इसीलिए भगवन शिव का एक नाम महेश है) रख कर वहां से निकलना चाहा तो भीम ने उनका पीछा किया। यह देख कर महादेव ने अपने बैल रुपी शरीर के हिस्से पांच जगहों पर छोड़े। ये स्थान केदारधाम यानि पंच केदार कहलाए। कहते हैं कि तुंगनाथ में 'बाहु' यानि शिव के बैल रूप की भुजा का हिस्सा स्थापित है। इसीलिए तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) में स्थापित शिवलिंग सामान्य शिवलिंग की तरह न होकर भुजानुमा है। वहीँ कहा जाता है की चंद्रशिला (Chandrashila) पर भगवान राम ने लंका से लौटने के बाद भगवन शिव का ध्यान लगा कर कुछ समय बिताया था।

चोपता, Chopta
चोपता (Chopta)
जोशीमठ (Joshimath) से वापस हम लोग तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) की और आगे बढ़ते हुए पहुंचे चमोली जहाँ से हमने अपना एक नया अडवेंचरस (Adventerous) सफर शुरू किआ। अडवेंचरस इसलिए क्यूंकि यह रास्ता हमारे लिए बिलकुल नया था और यह रास्ता बहुत ज्यादा चौड़ा नहीं है। रास्ते में बहुत ही घाना जंगल भी है। चमौली (Chamauli) से निकलने के बाद हम लोग गोपेश्वर (Gopeshwar) पहुंचे। गोपेश्वर (Gopeshwar) में एक प्राचीन शिव मंदिर है जो बहुत ही सुंदर है। गोपेश्वर पहुंचने के बाद हम लोगों ने खाना खाया। दोपहर का समय था खाना खाने के बाद हम लोग अपने सफर पर बढ़े। गोपेश्वर (Gopeshwar) से आगे बढ़ने पर बहुत ही घना जंगल मिला जिसमे लंगूर बहुत ही प्रचुर संख्या में थे। गोपेश्वर से निकलते समय हमने रास्ते पर लगी पट्टिका पढ़ी थी जिसमे साफ़ लिखा हुआ था की जंगली जानवरों से सावधान रहें। आप लोग जब भी आप केदारनाथ बद्रीनाथ मार्ग वाया चोपता सफर कर रहे हों तो जंगली जानवरों से सावधान रहें और कार आदि की शीशे बंद करकर ही सफर करें। रास्ते में गाड़ी कही न रोकें। पहाड़ी जंगलों में चलते चलते काफी समय बाद लगभग 5 बजे के आस पास हम लोग चोपता (Chopta) पहुंच ही गए। चोपता (Chopta) पहुंचते ही हमारा स्वागत भगवान् इंद्र ने किया। तेज बारिश के साथ पड़ते हुए ओलों ने मौसम को और भी ठंडा कर दिया था।

चोपता, Chopta
चोपता (Chopta)
लगभग 1 घंटे हुई बारिश के बाद हम लोग कांपने लग गए थे। चोपता में सड़क किनारे बनी एक छोटी सी चाय की दुकान में अंगीठी के पास बैठ कर चाय पी और इस तरह हम लोगों ने अपनी सर्दी भगायी। शाम के 6 बज चुके थे और रात बढ़ती जा रही थी इसलिए हम लोगों ने रूम तलाश किया जो बहुत आसानी से मिल गया। रूम का किराया भी बहुत कम था। केवल 1000 रूपये में हम 4 लोगों के लिए रूम मिल गया था। पहाड़ों पर होने के कारण चोपता में लाइट बहुत कम ही रहती है। मोबाइल फ़ोन में नेटवर्क नहीं था इसलिए हम लोग अपने घर बात भी नहीं कर सकते थे। इस परिस्थिति का हम लोग लुफ्त उठा रहे थे वही थोड़ी सी चिंता भी बनी हुई थी। मोमबत्ती की रौशनी में बैठना, बातें करना, खाना खाना और पत्ते खेलने का अनुभव अपने में ही अलग था। चोपता (Chopta) में तापमान कब 0 तक पहुंच जाता है पता ही नहीं चलता है। इसलिए हम लोगों ने खाना खाकर जल्दी से बिस्तर में घुसना ही सही समझा और रात्रि के 9:00 बजे तक हम लोग सो गए। 

यात्रा का पांचवा दिन (06 मई) (चोपता (Chopta) से तुंगनाथ महादेव (Tungnath Mahadev) ट्रेक और वापसी तथा चोपता (Chopta) से सीतापुर (Sitapur))- 

सुबह 07:00 बजे उठने के बाद हम लोग जल्दी से तैयार होने लगे। जैसा की मैंने आपको बताया था की चोपता में इलेक्ट्रिसिटी की कमी है और तापमान 0 से कम होने की वजह से हम लोगों को नहाने के लिए गरम पानी की जरुरत थी। चोपता (Chopta) में गरम पानी आपको चाय की दुकानों और ढाबों पर आसानी से मिल जाता है। गरम पानी लाने में आपके रूम का मैनेजर आपकी मदद करेगा। 50 रूपये प्रति बाल्टी की दर से हम लोगों को गरम पानी अपने रूम में मिल गया था जिससे हम लोग नहाये। नहाने के बाद हम लोगों ने अपनी तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) की ट्रेक शुरू की। तुंगनाथ महादेव का मंदिर चोपता से लगभग 3 से 3.5 किलोमीटर की दूरी पर है। इस दूरी को तय करने के लिए आप पैदल सफर कर सकते है और यदि आप इतनी दूरी पैदल तय नहीं कर सकते हैं तो आप चोपता से घोड़े या खच्चर भी ले सकते हैं। हम लोगों में तुंगनाथ महादेव की ट्रेक का उत्साह भरा हुआ था इसलिए पैदल निकल पड़े। ट्रेक पर चलने से पहले हम लोगों ने अपने साथ पानी की एक बोतल और कुछ चॉक्लेट्स ले ली थी। ट्रैक पर जाने से पहले ध्यान रखें की अपने ट्रैक पर पानी बार बार पीते रहें जिससे की आपका शरीर में पानी की कमी न हो। इंस्टेंट एनर्जी के लिए आप ग्लूकोस बिस्किट और चॉक्लेट्स रख सकते हैं। चोपता से थोड़ी सी दूर चलने पर ही हम लोगों के फ़ोन्स में नेटवर्क आ गया था। हम लोगों ने अपने अपने घर पर बात की। सब लोग अब बहुत खुश थे। बहुत ही लुभावना मौसम था। ठंडी हवा चल रही थी। जैसा की मैंने आपको बताया था की तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) सबसे अधिक ऊंचाई बना शिव मंदिर है और कल चोपता पहुंचते ही बारिश के साथ ओले पड़ चुके थे इसलिए हम लोगों ने गरम कपडे पहन लिए थे। यहाँ कब मौसम बदल जाता है कह नहीं सकते। बारिश भी कभी भी हो सकती है इसलिए यहाँ पर डिस्पोजेबल रेनकोट मिलते हैं जो एक बार इस्तेमाल किया जा सकता है।

तुंगनाथ महादेव मंदिर की यात्रा, Tungnath mahadev Temple Trek
तुंगनाथ महादेव मंदिर की यात्रा (Tungnath mahadev Temple Trek)
तुंगनाथ महादेव की ट्रेक शुरू करने से पहले हमने भी रेन कोट ले लिया था। थोड़ा दूर चलते ही पहाड़ों के बीच हम लोगों को बहुत ही सुंदर प्रकृति का नज़ारा दिखने लगा था। हरे भरे पहाड़ों पर घास चरती हुई गाय और भेड़-बकरियां किसी फिल्म के दृश्य की याद दिला रही थी। ऐसा नजारा वास्तव में शायद ही कही देखने को मिलेगा। ऐसे सुन्दर नज़ारे का आनंद लेते हुए धीरे धीरे हम लोग तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) की ओर बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में हम लोगों ने चाय की दुकानों पर चाय का भी लुफ्त लिया और साथ ही हल्का फुल्का नाश्ता भी किया। तुंगनाथ महादेव की ट्रेक में बहुत लोग शामिल रहते हैं। सभी लोग प्रकृति का आनंद ले रहे थे और फोटोज भी क्लिक कर रहे थे। यही फोटोज में कैद यादें हम सभी को फिर से ऐसा सफर करने को मजबूर और प्रेरित करती है। हम लोगों ने भी सेल्फीज़ ली और फोटोस लिए। तुंगनाथ महादेव ट्रेक के रास्ते में आपको बहुत से हिमालय की चोटियां देखने को मिलेंगे। इन चोटियों को पहचानने के लिए आप स्थानीय निवासियों से संपर्क कर सकते हैं और वह इसमें आपकी मदद जरूर करेंगे। धीरे धीरे 3 घंटे की ट्रैकिंग की बाद हम लोगों को तुंगनाथ महादेव की चोटी दिखाई देने लग गयी थी।

तुंगनाथ महादेव मंदिर, Tungnath mahadev Temple
तुंगनाथ महादेव मंदिर की यात्रा (Tungnath mahadev Temple)
चोटी दिखायी देते ही उत्सुकता में हमारी थकन मानो ख़तम सी हो गयी। मंदिर के बाहर बहुत सी दुकानें थी जहाँ आप फ्रेश हो सकते हैं, चाय पी सकते हैं और मंदिर में पूजा का सामान ले सकते हैं। हम लोग भी फ्रेश होकर मंदिर में दर्शन के लिए पहुंच चुके थे। मंदिर की वास्तुकला और निर्माण शैली को देखने से ही मंदिर की प्राचीनता का पता चल जाता है। मंदिर में भगवन महादेव विराजमान है साथ ही अन्य हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां पांडवों के साथ स्थापित हैं। मंदिर की भव्यता, सुंदरता और महत्ता को जानकर मैं मंत्र मुग्ध हो गया था।

तुंगनाथ महादेव मंदिर, Tungnath mahadev Temple
तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath mahadev Temple)
काफी देर मंदिर को बाहर से निहारने के बाद मंदिर के अंदर प्रवेश किया। मंदिर में पहुंचते ही मंदिर को बादलों ने घेर लिए और तेज बारिश शुरू हो गयी। बारिश के कारण मंदिर में कम लोग ही प्रवेश कर पाए थे। हम लोगों ने इसका फायदा उठाया और तुंगनाथ महादेव के अच्छे से दर्शन किये। तुंगनाथ महादेव दर्शन के साथ साथ हम लोगों ने मंदिर के पुजारी जी से मंदिर के बारे में ढेर सारी जानकारी ली। तुंगनाथ महादेव मंदिर के इतिहास को अच्छे से समझा। थोड़ी देर बाद बारिश हल्की होती चली गयी और हम लोग अपने रेनकोट पहन कर मंदिर से बाहर निकल आये। बारिश के बाद फिर से ठण्ड और बढ़ गयी थी। ठण्ड से बचने के लिए हम लोगों ने चाय पी और नास्ता किया। क्यूंकि पूरी पहाड़ी बादलों से घिरी हुई थी इसलिए हर तरफ धुंध छा गयी थी और कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था हवा में ओस की बूंदें तैर रही थी जो चेहरे पर पड़ने पर एक अलग ताज़गी का एहसास दे रही थी। चंद्रशिला ट्रेक पर जाना उस समय थोड़ा खतरनाक हो सकता था क्यूंकि वहां बारिश हो रही थी इसलिए इसी धुंध में हम लोगों ने वापस नीचे चोपता लौटने का फैसला किया। लगभग 2 बज चुके थे और हम लोगों ने वापस लौटना शुरू कर दिया था। ट्रेक से वापस लौटने में हम लोगों को केवल 2 घंटे का समय लगा। वापस चोपता लौटने के बाद हम लोगों ने खाना खाया और बिना देर किये सीधे केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) की यात्रा के लिए आगे बढ़ गए।

हिमालय, Himalaya
हिमालय (Himalaya)
चोपता (Chopta) से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है उखीमठ (Ukhimath)। उखीमठ (Ukhimath) बहुत ही प्रसिद्ध जगह है, कहा जाता है की बाणासुर की बेटी उषा और भगवन कृष्णा के पौत्र अनिरुद्ध का विवाह इसी स्थान पर हुआ था। इसीलिए इस जगह का नाम उखीमठ (Ukhimath) पड़ा। इसी स्थान पर सर्दियों में भगवान केदारनाथ जी को विराजमान किया जाता है और पूजा अर्चना की जाती है। साथ ही यहाँ पर भगवन शिव के ओंकारेश्वर स्वरुप की पूरे वर्ष भर पूजा की जाती है। उखीमठ (Ukhimath) होते हुए हम लोगों गुप्तकाशी (Guptakashi) पहुंचे। बताते हैं पांडवों को देखकर भगवान शिव गुप्तकाशी में छुप गए थे। गुप्तकाशी से भगवान शिव की तलाश करते हुए पांडव गौरीकुंड तक गए। लेकिन इसी जगह एक बड़ी विचित्र बात होती है। पांडवों में से नकुल और सहदेव को दूर एक बैल दिखाई देता है। भीम अपनी गदा से उस बैल को मारने दौड़ते हैं। लेकिन वह बैल उनकी पकड़ में नहीं आता है। भीम उसके पीछे दौड़ते हैं और एक जगह बैल बर्फ में अपने सिर को घुसा देता है। भीम पूंछ पकड़कर खींचते हैं। लेकिन बैल अपने शरीर का विस्तार करता है। शरीर का विस्तार इतना बड़ा होता है कि वह नेपाल के पशुपति नाथ तक पहुंचता है। देखते ही देखते वह बैल एक ज्योतिर्लिंग में बदल जाता है।

केदारनाथ मंदिर, Kedarnath Mandir
केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Mandir)
पुराण के अनुसार पशुपतिनाथ भी बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। फिर उससे भगवान शिव प्रकट होते हैं। भगवन शिव के दर्शन के बाद पांडव शाप मुक्त हो जाते हैं। गुप्तकाशी से निकलने के बाद हम लोग फाटा और रामपुर होते हुए सीतापुर (Sitapur) पहुंचे। शाम का समय हो गया था और अँधेरा बढ़ने लगा था। सिक्योरिटी कारणों से प्राइवेट गाड़ियों को सीतापुर (Sitapur) से आगे नहीं जाने दिया जा रहा था। इसलिए हम लोगों ने सीतापुर (Sitapur) में ही होटल लिया और आराम करके सुबह जल्दी केदारनाथ धाम यात्रा को शुरू करने का प्लान किया। केदारनाथ धाम जाने के लिए बहुत भीड़ थी इसलिए रूम भी बहुत ढूंढ़ने के बाद मिला। रूम मिलने के बाद हम लोगों ने अपनी कार पार्क की और रूम में चले गए। ट्रेक और सफर की थकान की वजह से खाना खाने के बाद कब नींद आयी और हम लोग सो गए पता ही नहीं चला।

नोट :- आपको मेरी यात्रा कैसी लगी ? अपने कमेंट में जरूर बताएं। धन्यवाद।



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