हमारी बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) के 5  दिन बीत चुके थे और हम लोगों ने अपने निर्धारित दर्शनीय स्थलों में से बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) और तुंगनाथ महादेव मंदिर (Tungnath Mahadev Temple) के दर्शन कर लिए थे। इन जगहों के अलावा हमने थोड़ा सा समय औली (Auli) में भी बिताया जिसकी वजह से हमारे सफर का समय थोड़ा बढ़ गया था। लेकिन सफर में नियतता का स्थान नहीं होना चाहिए। पांचवे दिन के शाम तक हम लोग लोग सीतापुर पहुंच गए थे जहाँ से हमारे बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) के अंतिम दर्शनीय स्थल केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) की यात्रा शुरू होने वाली थी। पिछले दिन की थकान अभी पूरी तरह से उतरी भी नहीं थी और शुरू होने वाली थी एक नयी सुबह जब हम लोग तैयार हो रहे थे अपनी केदारनाथ धाम की यात्रा (Kedarnath Dham Yatra) के लिए।

केदारनाथ मंदिर, Kedarnath Temple
केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple)
इस भाग में आपको अपनी केदारनाथ धाम की यात्रा (Kedarnath Dham Yatra) की जानकारी दुँगा जो शायद आपके लिए आपकी यात्रा में लाभदायक हो सकती है।

बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा के 8 दिन (भाग 3) (केदारनाथ मंदिर की यात्रा) Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra (Part- 3) (Kedarnath DhamYatra) 


यात्रा का छठवां दिन (07 मई) (सीतापुर(Sitapur) से केदारनाथ(Kedarnath Dham) यात्रा)-

केदारनाथ धाम मंदिर (Kedarnath Temple) की यात्रा हमारी बद्रीनाथ (Badrinath), तुंगनाथ (Tungnath) और केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham Temple) यात्रा का आखिरी और प्रमुख पड़ाव था। केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham Temple) की यात्रा जितनी प्रशिद्ध है उतनी ही दुर्गम भी है। कल की थकान के बाद आज हम लोग सुबह थोड़ा देर से जागे। सुबह 08 बज चुके थे और हम लोग अपने प्लान से लेट हो चुके थे। हम लोगों ने सुबह 06 बजे तक अपने रूम छोड़ने का प्लान किया था जिससे की हम लोग रात होने तक केदारनाथ धाम मंदिर के दर्शन कर वापस लौट कर आ पायें। आज हम लोग अपने लगभग 03 घंटे लेट हो चुके थे। हम लोगों ने नहाने के बाद 09 बजे तक अपना रूम छोड़ा और ट्रेक के लिए जरुरी सामान लेकर टैक्सी स्टैंड पर आ गये। सीतापुर (Sitapur) से हम लोगों ने एक शेयरिंग टैक्सी ली जिसने हम लोगों को सोनप्रयाग (Sonprayag) छोड़ा। सोनप्रयाग (Sonprayag) बासुकी (Vasuki) और मन्दाकिनी नदी (Mandakini) के संगम पर बना एक खूबसूरत सा शहर है। यहाँ पहुंचने पर सबसे पहले हम लोगों ने स्वयं को उत्तराखंड सरकार (Uttarakhand Government) द्वारा बनाये गए रजिस्ट्रेशन काउंटर्स पर रजिस्टर कराया।

सोनप्रयाग, Sonprayag
सोनप्रयाग (Sonprayag)
केदारनाथ धाम यात्रा (Kedarnath Dham Yatra) पर जाते समय सोनप्रयाग (Sonprayag) में सरकारी काउंटर्स पर आप रजिस्टर करा सकते हैं जिससे आपकी यात्रा का लेखा जोखा सरकार के पास रक्षित रहता है और वह किसी आकस्मिक स्थिति में आपकी सेवा कर सकते हैं। यह रजिस्ट्रेशन करना सभी केदारनाथ मंदिर यात्रियों के लिए अनिवार्य होता है। रजिस्ट्रेशन स्लिप देखने के बाद ही सुरक्षा कर्मी आपको सोनप्रयाग (Sonprayag) से आगे गौरीकुंड (Gaurikund) के लिए टैक्सी में बैठने की परमिशन देते हैं। सोनप्रयाग में हम लोगों ने अपने लिए डिस्पोजेबल रेनकोट ले लिए थे क्यंकि केदारनाथ मंदिर यात्रा (Kedarnath Temple Yatra) के समय भी बारिश का सामना करना पड़ सकता है। साथ ही ठण्ड के मौसम में बारिश में भीगने से आपकी तबियत ख़राब हो सकती है। इसलिए अपने स्वस्थ्य का पूरा ख्याल रखें।

सोनप्रयाग, Sonprayag
सोनप्रयाग (Sonprayag)
केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple) तक पहुंचने के लिए गौरीकुंड तक टैक्सी मिलती और वहां से आपको ट्रेक करके मंदिर तक पहुंचना होता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए ट्रेक के अलावा कुछ हेलीकाप्टर सर्विस प्रोवाइडर्स भी अपनी सेवा देते जिनको आप ऑनलाइन बुक कर सकते हैं। हैलीकॉप्टर्स के अलावा मंदिर के पहुंचने के लिए घोड़े और खच्चर, पालकी और पिटठू की व्यवस्था भी है जिनको आप सोनप्रयाग (Sonprayag) में सरकारी काउंटर्स से बुक कर सकते हैं। अपनी घोड़े या खच्चर, पालकी और पिटठू की रशीद को दिखा कर आप गौरी कुंड (Gaurikund) से सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। सोनप्रयाग(Sonprayag )में नास्ता करने के बाद हम लोग सिक्योरिटी चेक और टैक्सी की लाइन में लग गए। लगभग २ घंटे के लम्बे इन्तेजार के बाद हम लोगों का नंबर आया और टैक्सी से हम लोग गौरीकुंड पहुंचे। गौरी कुंड से ही केदारनाथ धाम मंदिर (Kedarnath Temple Yatra) यात्रा शुरू होती है। केदारनाथ धाम यात्रा में गौरीकुंड का अहम् स्थान है। गौरीकुंड में देवी गौरी को समर्पित एक सुंदर एवं प्राचीन मंदिर है। मंदिर गर्भ में शिव और पार्वती की प्रतिमाएं विराजमान हैं। यहां एक पार्वतीशिला भी है जिसके बारे में माना जाता है कि पार्वती ने यहां बैठकर ध्यान लगाया था। मंदिर परिसर में एक गरम पानी का कुंड भी है जिसके नाम पर यहाँ का नाम गौरीकुंड पड़ा। गौरी कुंड पहुंच कर हम लोगों ने ट्रैकिंग के लिए अपने साथ छड़ी ली जिससे चढ़ाई वाली जगह पर चलने में आसानी हो। ध्यान रखें की केदारनाथ मंदिर की ट्रेक(Kedarnath Temple Trek) का रास्ता लगभग कुल 16 किलोमीटर लम्बा है। पहाड़ों पर ट्रेक करते समय कभी भी जल्दबाज़ी न करें। शरीर की क्षमता के अनुसार धीरे धीरे चलें। बीच बीच में उपयुक्त स्थान पर बैठ कर शरीर को वातावरण के अनुसार ढलने दें। पहाड़ पर हवा का दवाब कम होता है इसलिए सांस लेने में परेशानी हो सकती है। कृपया ध्यान दें की आप अपने साथ पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलिंडर साथ रखें। अगर आप सिलिंडर नहीं ले सकते हैं तो अपने साथ कपूर या विक्स जैसी इन्हेलर रख सकते हैं जिनको आप सूंघ कर सामान्य हो सकते है। साथ ही यह जरूर ध्यान दें की कपूर और विक्स जैसी इन्हेलर्स का ज्यादा उपयोग न करें। जब आवश्यकता हो तभी उपयोग करें। ट्रेक करते समय बीच बीच में बैठ कर प्राणायाम करें जो आपको सामान्य रहने में मदद करता है। ट्रेक के रास्ते में उत्तराखंड सरकार द्वारा स्वस्थ केंद्रों की भी व्यवस्था की गयी है जहाँ आप प्राथमिक उपचार ले सकते हैं। किसी आकस्मिक स्थिति में आप स्वस्थ केंद्र पर रिपोर्ट कर सकते हैं जिससे की आपको वापस भेजा जा सके।

भैरों मंदिर (Bhairon Temple)
हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु गौरीकुंड पहुंच चुके थे और केदारनाथ मंदिर की यात्रा शुरू गयी थी। हम लोग भी अपनी कमर कस चुके थे 16 किलोमीटर लम्बी केदारनाथ मंदिर की यात्रा के लिए और गर्म कपड़ों से खुद को कस कर हम लोग निकल पड़े केदारनाथ धाम ट्रेक (Keadrnath Trek) पर। केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple) की यात्रा के उत्साह से सराबोर सभी श्रद्धालु धीरे धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे। गौरी कुंड का मौसम भी बहुत सुहाना था। आसमान में बादल साफ़ दिखाई पड़ रहे थे। थोड़ा आगे चलने पर ही मौसम ने करवट सी ली और जहाँ हलकी धूप में शुरू हुआ सफर घने बादलों की साये में बदल गया। हलकी हलकी बारिश भी शुरू हो गयी थी। बारिश की बूंदें मुँह पर पड़ते ही ताजगी का अनुभव होने लगा। लेकिन बारिश में भीगना हमारे लिए सही नहीं था। पैदल चलने से शरीर में गर्मी सी आगयी थी और ऐसे में बारिश में भीगना बीमारी को दावत देने जैसा था। साथ ही भीगने से हमारे गरम कपडे बहुत भारी हो सकते थे जिन्हे पहन कर आगे चलना बहुत मुश्किल था। इसलिए हम लोगों ने अपने अपने डिस्पोजेबल रेनकोट पहन लिए और आगे की ट्रेक शुरू की। मौसम भी अजीब आंखमिचोली खेल रहा था। कभी धुप, कभी बादल और कभी बारिश ने हमारे ट्रेक को और भी रोमांचित कर दिया था। केदारनाथ मंदिर की ट्रेक के शुरुआती 5 से 6 किलोमीटर की ट्रेक महादेव के जयकारों और उत्सुकता में कब हो गयी पता ही नहीं चला धीरे धीरे थकान होना शुरू हो गयी थी।

रामबाड़ा पुल, Rambada Bridge
रामबाड़ा पुल (Rambada Bridge)
रामबाड़ा पुल पहुंचने पर थकान का अनुभव होने लगा गया था और हमारी रफ्तार धीरे होना शुरू हो गयी । रामबाड़ा पुल मन्दाकिनी नदी के ऊपर बना हुआ है। 2013 की केदारनाथ त्राश्दी से पहले इस पुल को पार नहीं करना पड़ता था। केदारनाथ यात्रा का पुराना रास्ता केदारनाथ त्राश्दी में नस्ट होने के बाद नया रास्ता रामबाड़ा पुल से मन्दाकिनी नदी के दूसरी और से बनाया गया है। केदारनाथ मंदिर की यात्रा के समय आपको पुराने रास्ते अवशेष देखने को भी मिलते हैं। रामबाड़ा पल से मन्दाकिनी नदी पार करने के बाद केदारनाथ धाम यात्रा का रास्ता और भी दुर्गम होता जाता है। अपनी उत्सुकता के चलते हम लोग अपने आखिरी पड़ाव केदारनाथ धाम की और आगे बढ़ते चले जा रहे थे। यात्रा करते समय हेलीकाप्टर की आवाज़ भी जयकारों में दबती जा रही थी। श्रद्धालुओं के उत्साह को केदारनाथ नाथ के आस पास की चोटियों पर दिखती बर्फ बढ़ा रही थी।

केदारनाथ धाम यात्रा, Kedarnath Dham Yatra
केदारनाथ धाम की यात्रा (Kedarnath Dham Yatra)
नज़ारा देखने लायक था। जैसे जैसे हम लोग आगे बढ़ रहे थे बर्फीले पहाड़ पास आते जा रहे थे वैसे वैसे ठंडी हवाओं के झोंके तेज होते जा रहे थे। रामबाड़ा पुल से जंगल चट्टी और भीमबली होते हुए हम लोग लिंचौली पहुंच चुके थे लेकिन लगभग 11 किलोमीटर ट्रेक करने के बाद हम लोगों की हालत पस्त होने लगी थी। इतने लम्बे ट्रेक का यह हमारा पहला अनुभव था। थकान की वजह से पैर आगे बढ़ ही नहीं रहे थे। अभी हमारा सफर लगभग 5 किलोमीटर बाकी था। लेकिन हिम्मत करकर हम लोग धीरे धीरे केदारनाथ बेस कैंप (Kedarnath Base Camp) पहुंचे। केदारनाथ बेस कैंप से केदारनाथ मंदिर की दूरी केवल 1 किलोमीटर है।

लिंचौली (Linchauli)
केदारनाथ बेस कैंप पहुंचते रात हो चुकी थी और मौसम भी ख़राब हो रहा था। शाम से ही बर्फ़बारी शुरू हो गयी थी। केदारनाथ बेस कैंप में रुकने की बहुत अच्छी व्यवस्था है। रात गुजरने के लिए वाटरप्रूफ टेंट्स लगे हुए हैं। जिनमे डोरमेट्रीस बनी है जहाँ आप बहुत ही किफायती दरों पर बिस्तर ले सकते है। अगर आप स्लीपिंग बैग्स लेना चाहते हैं तो स्लीपिंग बैग्स भी आसानी से मिल सकता है। केदारनाथ बेस कैंप में रुकने की इतनी सुन्दर व्यवस्था वहां के लोकल निवासियों द्वारा बनाये गए ढाबों पर ही है, इसके अलावा वहां आपको गढ़वाल टूरिज्म की ओर से भी डोरमेट्रियस मुहैया कराई जाती हैं। हम लोगों ने 300 रूपये प्रति बेड के हिसाब से सभी के लिए बेड लिया और ढाबे पर खाना खाने के बाद सीधे अपने बिस्तर में घुस गए। बर्फ़बारी की वजह से ठण्ड बहुत बढ़ गयी थी। सब लोग बहुत थके हुए थे इसलिए कब नींद ने सबको अपने आगोश में ले लिया पता ही नहीं चला। ऊंचाई पर होने की वजह से बेचैनी बनी हुई थी। ध्यान रखिये की ऊंचाई पर जाने से पहले अपने स्वास्थ्य का परिक्षण कराकर और डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही सफर करें।

यात्रा का सातवां दिन (08 मई) (केदारनाथ(Kedarnath Dham) दर्शन, केदारनाथ (Kedarnath) सीतापुर(Sitapur) और सीतापुर से रूद्र प्रयाग(Rudraprayag))-

पहाड़ों पर हवा का दवाव ऊंचाई बढ़ने के साथ कम होता जाता है जिसकी वजह से साँस लेने में कठिनाई होती है और बेचैनी सी बनी रहती है। बेचैनी की वजह से सब लोग जल्द उठ गए थे। जब हम लोग अपने टेंट से बाहर निकले तो बर्फ की मोटी चादर चारों तरफ बिछी हुई थी।

केदारनाथ बेस कैंप, Kedarnath Base Camp
केदारनाथ बेस कैंप (Kedarnath Base Camp)
जिसे देख कर ऐसा लग रहा था जैसे हम लोग स्वर्ग में आगये हों। बाहर का नज़ारा देखकर हमारी थकान पता नहीं कहाँ चली गयी थी। बर्फ़बारी की वजह से ठण्ड काफी बढ़ गयी थी केदारनाथ का तापमान 0 से भी नीचे पहुंच गया था। हम लोग तैयार होकर ढाबे पर पहुंचे और ठण्ड भगाने के लिए चाय पी। और निकल पड़े केदारनाथ मंदिर की ओर। बर्फ की चादर पर चलते हुए कुछ राजकुमार जैसी अनुभूति हो रही थी। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति ने वह चादर हमारे लिए ही बिछाई हो। सुबह का समय था और मंदिर पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगा। मन्दाकिनी नदी को पार करते ही मंदिर दिखाई देने लग गया था। बर्फ के मैदान के बीचों बीच मंदिर का भवन हीरे की तरह चमक रहा था। सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते हम लोग केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Mandir) के भवन तक पहुंच चुके थे। हम लोगों की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

केदारनाथ मंदिर, Kedarnath Temple
केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple)
अपने बैग्स मंदिर के पास की प्रशाद की दुकान पर रखकर हमलोग सीधे केदारनाथ मंदिर के बाहर पहुंच गए। बर्फ़बारी की वजह से मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बहुत कम थी। बर्फ ने फर्श को पूरा ढक लिया था और बर्फ़बारी अभी भी जारी थी। नंगे पैर बर्फ के फर्श पर चल हम लोगों ने मंदिर के अंदर प्रवेश किया। मंदिर बाहर से जितना भव्य, विशाल और सुंदर दिखाई देता है अंदर से उतना ही मनमोहक, प्राचीन और आकर्षक है। मंदिर को निहारते हुए आँखें थक नहीं रही थी। मंदिर में प्रवेश करने पर पहले कक्ष में नंदी बीचों बीच विराजमान हैं। साथ ही मंदिर की दीवारों पर पांडव परिवार की मूर्तियां भगवान श्रीकृष्ण के साथ उकेरी गयी है जो सजीव दिखाई पड़ती हैं। कहा जाता है इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने महाभारत के युध के बाद स्वर्ग जाते समय की थी। यह मंदिर पांडवो द्वारा स्थापित पांच केदार में से एक और सबसे मुख्य है। केदारनाथ भगवन शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। हिन्दू धर्म में केदारनाथ धाम की बहुत महत्ता है। मंदिर के पहले कक्ष से होते हुए हम लोग दूसरे कक्ष में पहुंचे जहाँ पर केदारनाथ रुपी भगवन शिव का शिवलिंग स्थापित है। प्राचीन कथा के अनुसार जब स्वर्ग जाते समय पांडवों में से भीम ने बैल रुपी भगवन शिव को पकड़ना चाहा था तब इसी स्थान पर बैल का कूबड़ त्याग किया था। इसी वजह से केदारनाथ में स्थापित शिवलिंग कूबड़ नुमा है। मंदिर में कोई भीड़ नहीं थी इसलिए हम लोगों को दर्शन के लिए बहुत समय मिला। मंदिर में अच्छे से पूजा और रुद्राभिषेक करने के बाद हम लोग मंदिर से बहार निकले। लगभग 9 बज चुके थे। मंदिर के बाहर निकलते ही पता चला की केदारनाथ के तत्कालिक मौसम के बारे में मौसम विभाग द्वारा भरी बर्फ़बारी की चेतावनी दी गयी है।

केदारनाथ मंदिर, Kedarnath Temple
केदारनाथ मंदिर (Kedarnath Temple)
ऐन डी आर एफ (NDRF) और एस डी आर एफ (SDRF) की टीम ने मंदिर को घेर लिया था और वहां उपास्थित सभी श्रद्धालुओं को नीचे गौरीकुंड जाने का आग्रह करने लगे थे। हम लोगों ने भी वहां ज्यादा समय बिताना सही नहीं समझा। हमारा उद्देश्य पूर्ण हो चूका था। इसलिए हम लोग भी केदारनाथ भगवान का आशीर्वाद लेकर वापस लौटने लगे। केदारनाथ दर्शन के बाद एक नयी स्फूर्ति का संचार होने लगा था। हम लोग अब तेज क़दमों से वापस लौटने लग गए थे। ध्यान रखें की पहाड़ों पर चढ़ने और उतरने के समय सावधानी अवश्य रखें। असावधानी किसी भी दुर्घटना को निमंत्रण दे सकती है। मंदिर परिसर से बाहर निकलते निकलते हम लोगों को लगभग 10 बज चुके थे। बर्फ़बारी अभी भी चालू थी और इसलिए हम लोगों ने रेन कोट्स पहन लिए थे। धीरे धीरे आगे बढ़ते हुए हम लोग लिंचौली पहुंचे जहाँ हम लोगों ने नाश्ता किया। 7 दिन के सफर की थकान के बाद अब मन था आराम करने का इसलिए हम लोग धीरे धीरे नीचे लौट रहे थे। लौटने के समय 16 किलोमीटर लम्बा ट्रेक हमने केवल 6 घंटे में पूरा कर लिया था। गौरी कुंड पहुंच कर हम लोगों ने शेयरिंग टैक्सी ली और सोनप्रयाग पहुंचे और वहां अपना रिटर्निंग वेरिफिकेशन कराने के बाद सीधे सीतापुर कार पार्किंग पहुंचे।

केदारनाथ धाम यात्रा, Kedarnath Dham Yatra
केदारनाथ धाम की यात्रा (Kedarnath Dham Yatra)
रास्ते में तेज बारिश की वजह से हमारे कपडे रेन कोट्स के अंदर भी भीग गए थे इसलिए हम लोगों ने कपडे चेंज किये और कार में बैठ कर निकल लिए वापस अपने घर हाथरस की और। सीतापुर से रामपुर, फाटा और गुप्तकाशी होते हुए हम लोग अगस्त्यमुनि (Agastyamuni)पहुंचे। अगस्त्यमुनि मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है। यह वहीं स्‍थान है जहां ऋषि अगस्‍त्‍य ने कई वर्षों तक तपस्‍या की थी। महर्षि अगस्त्य के तपोस्थल होने से इसका नाम अगस्त्यमुनि पड़ा। यहाँ महर्षि अगस्त्य का प्राचीन मन्दिर है। अगस्त्यमुनि में एक बड़ा मैदान है जहाँ वर्तमान में एक स्टेडियम बना है। बैसाखी के अवसर पर यहाँ बहुत ही बड़ा मेला लगता है। अगस्त्यमुनि से हम लोग रुद्रप्रयाग पहुंचे। रुद्रप्रयाग पहुंचते पहुंचते रात के 8 बज चुके थे। थकान भी बहुत हो गयी थी और भूख भी लगी थी। इसलिए हम लोगों ने एक होटल में रूम्स लिए और खाना खा कर सो गए। 

यात्रा का आठवां दिन (09 मई) (रुद्रप्रयाग(Rudraprayag) से हाथरस(Hathras) वाया ऋषिकेश ,हरिद्वार, मेरठ)-

ट्रेक की वजह से सभी बहुत ज्यादा थक गए थे। सुबह 9 बजे करीब हमारी नींद खुली। एक लम्बी नींद लेने के बाद थकान में कुछ आराम मिला। उठकर सब लोग फ्रेश हुए और नास्ता करने के बाद अपने घर को निकल पड़े। आज हमारी यात्रा को आठवा दिन था और अभी भी सफर की थकन सभी की आँख में दिखाई पड़ती थी।

रुद्रप्रयाग (Rudraprayag)
रुद्रप्रयाग से हम लोग श्रीनगर, देवप्रयाग, ऋषिकेश, हरिद्वार होते हुए रुड़की पहुंचे जहाँ खाना खाने के बाद मुजफ्फरनगर, मेरठ, हापुड़ होते हुए बुलंदशहर पहुंचे। बुलंदशहर पहुंच कर हम लोगों ने रात्रि भोज किया और अलीगढ होते हुए हाथरस पहुंचे। हाथरस पहुंचते हमको रात के 10 बज चुके थे। बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा के 8 दिन का यह सफर हमारे लिए बहुत ही ज्ञानवर्धक और यादगार बन गया था। घर पहुंचने पर सब लोग बहुत खुश हुए। 

आशा करता हूँ कि आपको मेरा बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा का (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) यात्रा वृत्रांत पसंद आया होगा। किसी भी सुझाव या सहायता के लिए निसंकोच संपर्क करें। धन्यवाद।



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