यह यात्रा व्रत्रांत मेरी बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) का है। मैंने बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) मई के महीने में की थी जब बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम के पट खुले ही थे। बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) हिन्दुओं के देवता श्री विष्णु का प्रतीक है और श्री केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) और तुंगनाथ (Tungnath Mahadev) हिन्दुओं के देवता श्री शंकर जी का प्रतीक है। ये तीनो जगह भारत के उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित हैं।

बद्रीनाथ धाम, Badrinath Dham
Badrinath Dham (बद्रीनाथ धाम)
भारत (India) धार्मिक विविधता का देश है और यहाँ पर सभी धर्मों के लोगों के लिए समान स्थान है। भारत में सबसे बहुतायत में हिन्दू धर्म के लोग हैं और हिन्दू धर्म के लोग अपने इष्ट देव की पूजा करने के लिए मंदिरों में जाते हैं। हिन्दुओं के देवताओं में शंकर, विष्णु, देवी दुर्गा, कृष्णा, राम आदि हैं, जिनकी पूजा के लिए अलग अलग मंदिर बने हुए हैं। अपने घूमने और नई जगह की जिज्ञासा में इस बार मेरा मन कुछ आध्यात्मिक जगह जाने का किया। इसलिए इस बार मेने प्लान किआ हिन्दू धर्म के सबसे पवित्र मंदिरों में से बद्रीनाथ धाम, केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) और तुंगनाथ महादेव (Tungnath Mahadev) की यात्रा के लिए। इस बार की हमारी यात्रा मेरे घर हाथरस से जो की आगरा, अलीगढ और मथुरा के बीच उत्तरप्रदेश में स्थित से शुरू हुई। यात्रा में हम 4 लोग अपनी कार से साथ में चले। हालाँकि अगर आप चाहे तो अपनी यात्रा बस से भी कर सकते हैं और इसके लिए उत्तरांचल परिवहन निगम की बसें उपलब्ध हैं जो नियमित अंतराल पर दिल्ली और हरिद्वार से गढ़वाल क्षेत्र के बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham), केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) और तुंगनाथ महादेव (Tungnath Mahadev) के लिए जाती हैं। इस यात्रा के लिए हमारी तैयारियां जोरों पर थी और यात्रा के दिन सुबह ही हमको निकलना था। अब वो दिन आ गया था जब हम लोग घर से रवाना हुए अपनी बद्रीनाथ (Badrinath Dham), तुंगनाथ (Tungnath Mahadev) और केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) यात्रा के लिए। बैग्स हम लोग पहले ही पैक कर चुके थे जिसमे हमने अपने कपडे, दवाइयां, आइडेंटिटी कार्ड्स, कुछ खाने पीने के लिए सामान रख लिया था। हम लोगों की यह यात्रा मई के महीने में थी इसलिए हमने अपने साथ कुछ गर्म कपडे भी रख लिए थे क्यूंकि उस समय बद्रीनाथ (Badrinath Dham), तुंगनाथ (Tungnath Mahadev) और केदारनाथ धाम (Kedarnath Dham) में ठण्ड का मौसम रहता है। इस तरह हम लोग अपनी यात्रा के लिए निकल लिए।

बद्रीनाथ धाम, Badrinath Dham
बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham)

बद्रीनाथ धाम, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा के 8 दिन का विवरण (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra)


  • 02 मई - हाथरस(Hathras) से हरिद्वार(Haridwar) वाया मेरठ (Meerut)।
  • 03 मई - हरिद्वार(Haridwar) से जोशीमठ(Joshimath) वाया श्रीनगर(Srinagar)।
  • 04 मई - जोशीमठ(Joshimath) से बद्रीनाथ(Badrinath Dham), बद्रीनाथ दर्शन, माना गांव, और बद्रीनाथ से जोशीमठ(Joshimath)।
  • 05 मई - जोशीमठ(Joshimath) से औली(Auli), औली भ्रमण और औली से चोपता(Chopta)।
  • 06 मई - चोपता(Chopta) से तुंगनाथ महादेव(Tungnath Mahadev) ट्रेक और वापसी तथा चोपता(Chopta) से सीतापुर(Sitapur)।
  • 07 मई - सीतापुर(Sitapur) से केदारनाथ(Kedarnath Dham) यात्रा।
  • 08 मई - केदारनाथ(Kedarnath Dham) दर्शन, केदारनाथ से सीतापुर और सीतापुर से रूद्र प्रयाग(Rudraprayag)।
  • 09 मई - रुद्रप्रयाग(Rudraprayag) से हाथरस वाया ऋषिकेश ,हरिद्वार, मेरठ। 

यात्रा का पहला दिन (02 मई) ( हाथरस (Hathras) से हरिद्वार (Haridwar) वाया मेरठ (Meerut) ) -

Haridwar
हरिद्वार (Haridwar)
हम सभी अपनी बद्रीनाथ (Badrinath), तुंगनाथ (Tungnath) और केदारनाथ (Kedarnath) यात्रा को लेकर बहुत उत्साहित थे। सुबह जल्दी से उठकर हमने अपनी पैकिंग को चेक किया और खाने पीने की चीजों का एक अलग से बैग पैक किया जिसमें हमने नमकीन, बिस्कुट, घर पर बनी हुई कुछ स्नैक्स, मिठाइयां, चॉक्लेट्स आदि रखी। मेरे साथी 10 बजे मेरे घर के बाहर कार लेकर खड़े हुए थे। और इस तरह हम लोगों ने अपने घर से यात्रा का शुभारम्भ किया। उत्साह से भरे हुए हम लोग 10:30 पर हाथरस से अपने पहले पड़ाव हरिद्वार (Haridwar) के लिए चल दिए। मई के समय में मैदानी इलाकों की जमीन गर्मी से तिलमिलाई रहती है और ऐसे समय में एक अलग ही आवो हवा का इंतज़ार था हम लोगों को। सफर कितनी आसानी से बात करते कट रहा था बता नहीं सकता और 170 किलोमीटर लम्बा मेरठ (Meerut) तक का सफर कब पूरा हो गया पता ही नहीं चला। क्यूंकि हम लोगों ने केवल सुबह नास्ता ही किया था इसलिए मेने घर से खाना पैक करा लिया था। आगे आने वाले सफर में हम लोगों को बाहर ही खाना खाना था। हमको चलते हुए दोपहर के 03 बज गए थे और सभी को भूख भी लगने लगी थी तो हम लोगों ने मेरठ निकलने के बाद अपना खाना खाया और आगे का सफ़र फिर से शुरू किया। मेरठ से हरिद्वार की दूरी लगभग 150 किलोमीटर की है और इसको तय करने में हमको लगभग 03 घंटे का समय लगा। इस तरह लगभग 08 घंटे के सफ़र के बाद हम लोग हरिद्वार की पावन भूमि पर पहुंचे। आज के सफ़र के लिए यही हमारा पड़ाव था। सुबह हम लोगों को जल्दी उठ कर गंगा स्नान करके आगे बढ़ना था इसलिए रात में रुकने के लिए हमने होटल में रूम लिया और खाना खाने के बाद सीधे सोने चले गए।

यात्रा का दूसरा दिन (03 मई) ( हरिद्वार (Haridwar) से जोशीमठ (Joshimath) वाया श्रीनगर (Srinagar) ) - 

बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) का यह हमारा दूसरा दिन था सुबह के 06 बज चुके थे और जागने के बाद हम सभी चल दिए माँ गंगा के स्नान के लिए हरिद्वार की हर की पौड़ी (Har Ki Paudi) की ओर।

हर की पौड़ी, Har Ki Paudi
हर की पौड़ी (Har Ki Paudi)
हर की पौड़ी (Har Ki Paudi) घाट पहुंचने के बाद हम सभी ने बारी बारी से गंगा के निर्मल और पवित्र जल में स्नान किआ। हरिद्वार में गंगा नदी का बहाव बहुत तेज होता है इसलिए पक्के घाटों पर स्नान के लिए बेरिकेडिंग की गयी है साथ ही पकड़ कर नहाने के लिए मोटी मोटी लोहे की जंजीर भी डाली गयी है जिन्हे आप सावधानी के लिए पकड़ सकते हैं। गंगा स्नान करते करते 08 बज चुके थे और हमारा सफर काफी लम्बा था इसलिए हम लोग अपने सफर पर आगे बढ़ चले।

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हर की पौड़ी (Har Ki Paudi)
ऋषिकेश (Rishikesh) पहुंचकर रास्ते की दुकानों पर हम लोगों ने सुबह का नाश्ता किया। बहुत ही सादा सा चाय और कचौरी का नाश्ता करने के बाद हम लोग अपनी बद्रीनाथ, तुंगनाथ और केदारनाथ धाम यात्रा (Badrinath, Tungnath and Kedarnath Dham Yatra) के लिए निकल पड़े। नाश्ता करने के बाद हमारा अगला पड़ाव था देवप्रयाग (Devprayag)। बद्री नाथ धाम (Badrinath dham) की यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले पांच प्रयागों में यह पहला प्रयाग है। भागीरथी (Bhagirathi) और अलकनंदा (Alaknanda) नदी के संगम पर बसा यह छोटा सा शहर बहुत ही सुन्दर है। जब आप देवप्रयाग (Devprayag) में प्रवेश करते हैं तो हाईवे से ही आपको भागीरथी (Bhagirathi)और अलकनंदा (Alaknanda) नदी का संगम एकदम साफ़ दिखाई देता है।

देवप्रयाग,  Devprayag
देवप्रयाग (Devprayag)
 देवप्रयाग (Devprayag) ही वह स्थान है जहाँ से भागीरथी गंगा (Ganga) कहलायी हैं। यह तो आप सभी जानते होंगे की गंगा (Ganga) नदी को भगीरथ जी (Bhagirath) अपनी घोर तपस्या से पृथ्वी पर लाये थे इसलिए गंगा (Ganga) का नाम भागीरथी (Bhagirathi) पड़ा और गौमुख (Gaumukh) से लेकर देवप्रयाग (Devprayag) तक आज भी भागीरथी (Bhagirathi) के नाम से ही जानी जाती हैं। भागीरथी (Bhagirathi) में अलकनंदा (Alaknanda) नदी के विलय के बाद यह नदी गंगा (Ganga) कहलाती है और हिमालय के पहाड़ों से निकल कर मैदानों में जीवन देती है। देवप्रयाग (Devprayag) में आप भागीरथी (Bhagirathi और अलकनंदा (Alaknanda) नदी को आसानी से पहचान सकते हैं क्यूंकि भागीरथी (Bhagirathi) का पानी एकदम साफ़, निर्मल, स्वच्छ और हरे रंग का दिखाई पड़ता है वहीँ अलकनंदा (Alaknanda) नदी का पानी तेज बहाव के साथ मटमैले रंग का दिखाई पड़ता है।
भागीरथी, Bhagirathi
भागीरथी (Bhagirathi)
सुबह के समय पानी में सूरज की किरणें पड़ने पर पानी की चमक से पूरा वातावरण प्रदीप्त हो जाता है। कुछ समय बिताने के बाद हम लोग वहां से आगे बढे और पहुंचे 40 किलोमीटर दूर श्रीनगर (Srinagar) में। दोस्तों आप इस श्रीनगर (Srinagar) को लेकर जम्मू कश्मीर (Jammu-Kashmir) की राजधानी श्रीनगर (Srinagar) से कंफ्यूज न होईयेगा यह श्रीनगर अलग है। लेकिन ऋषिकेश (Rishikesh) से निकलने के बाद यह शहर ऐसा मिला जहाँ हम लोगों को बाजार में कुछ भीड़ मिली या ये कहिये की यहाँ का बाज़ार बहुत बड़ा है और यह शहर भी काफी बड़ा था। अभी हमारा सफर बहुत बाकी था इसलिए हम लोग बिना रुके आगे बढ़ते रहे और पहुंचे रुद्रप्रयाग (Rudraprayag)। बद्री नाथ धाम (Badrinath Dham) की यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले पांच प्रयागों में यह दूसरा प्रयाग है। रुद्रप्रयाग (Rudraprayag) की भी अपनी विशेषता है। रुद्रप्रयाग (Rudraprayag) अलकनंदा (Alaknanda) तथा मंदाकिनी (Mandakini) नदियों का संगमस्थल है। यहाँ से निकलकर अलकनंदा (Alaknanda) देवप्रयाग (Devprayag) में जाकर भागीरथी से मिलती है तथा गंगा नदी बन जाती है। प्रसिद्ध धर्मस्थल केदारनाथ धाम (Kedarnath) रुद्रप्रयाग(Rudraprayag) से 86 किलोमीटर दूर है। ऐसा माना जाता है कि यहां नारद मुनि ने भगवान शिव की उपासना की थी और नारद जी को आर्शीवाद देने के लिए ही भगवान शिव ने रौद्र रूप में अवतार लिया था। भगवान शिव के रौद्र रूप के अवतार पर रूद्रप्रयाग (Rudraprayag) का नाम रखा गया है। समय हो चला था और चलते चलते काफी देर भी हो गयी थी इसलिए सभी को भूख लगने लगी तो अपने अगले पड़ाव गौचर (Gauchar) पर हम लोगों से कुछ खाने का मन बनाया। गौचर (Gauchar) बद्रीनाथ (Badrinath Dham) के रस्ते में पड़ने वाली एक प्रमुख व्यावसायिक जगह है।

हिमालय, Himalaya
हिमालय (Himalaya)
पहाड़ों पर रोजमर्रा की चीजें भी आसानी से नहीं मिलती है इसलिए वहां के लोगों ने गौचर (Gauchar) को चुना एक ऐसे स्थान के लिए जहाँ पर मेला लगाया जा सके और जिसमे संस्कृति के साथ साथ व्यावसायिक चीजों का आदान प्रदान हो सके जिससे की पहाड़ों पर जीवन सुगम हो सके। इसलिए गौचर (Gauchar) में प्रतिवर्ष एक मेले का आयोजन होता है जो एक हफ्ते तक चलता है। पहले तो यह मेला कभी भी लगाया जाता था लेकिन आज़ादी के बाद से यह मेला हर साल भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के जन्म दिवस 14 नवंबर से एक हफ्ते के लिए लगाया जाता है। गौचर (Gauchar) पहुंच कर हम सभी ने खाना खाया और कुछ देर प्रकृति का आनंद लिया। यहाँ पर आपको सफर से सम्बंधित एक बात जरूर बताना चाहूंगा की ध्यान रखें की सफर करते समय कभी भी बहुत अधिक पेट भरकर खाना न खायें। पानी अधिक से अधिक मात्रा में पियें। पहाड़ों पर सफर करते समय डिहाइड्रेशन से बचना आपका लक्ष्य रहना चाहिए नहीं तो आप बीमार पड़ सकते हैं। एनर्जी ड्रिंक्स साथ रखें और समय समय पर पिते रहें। दोपहर के 3 बज चुके थे गौचर (Gauchar) से निकलते हुए और हमारा अगला पड़ाव था बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham)। गौचर (Gauchar) से हम लोग कर्णप्रयाग (Karnprayag) पहुंचे। बद्री नाथ धाम (Badrinath Dham) की यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले पांच प्रयागों में यह तीसरा प्रयाग है कर्णप्रयाग (Karnprayag) अलकनंदा (Alaknanda) तथा पिण्डर (Pinder) नदियों के संगम पर स्थित है। पिण्डर का एक नाम कर्ण गंगा (Karn Ganga) भी है, जिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग (Karnprayag) पडा। यहां पर उमा मंदिर और कर्ण मंदिर है जो प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। कर्णप्रयाग (Karnprayag) का नाम कर्ण के नाम पर भी पड़ा है। प्राचीनकाल में बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) की यात्रा के समय साधु संत कर्णप्रयाग (Karnprayag) आकर ही रुकते थे। कर्णप्रयाग से निकलने के बाद हम लोगों का अगला पड़ाव था नंदप्रयाग। बद्री नाथ धाम (Badrinath Dham) की यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले पांच प्रयागों में यह चौथा प्रयाग है। नंदप्रयाग (Nandprayag) एक बहुत ही प्रसिद्ध जगह है जो बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) जाते समय रास्ते में पड़ती है जैसा कि आप नाम से समझ रहे होंगे कि यह जगह नंद बाबा, जो कि भगवान श्री कृष्ण के पिता थे, के नाम पर इस जगह का नाम नंदप्रयाग (Nandprayag) पड़ा इसके अलावा यह जगह नंदाकिनी नदी (Nandakini) और अलकनंदा नदी (Alaknanda) का संगम भी है। इस जगह के साथ कई कहानियां प्रचलित हैं जैसे यहां पर नंद बाबा ने महायज्ञ किया था जिसकी वजह से इस जगह का नाम नंदप्रयाग पड़ा इसके अलावा एक अन्य कहानी भी प्रचलित है जिसके अनुसार यहां पर एक पुजारी जी को ऐसा सपना आया की अलकनंदा नदी में देवी की एक मूर्ति बह रही है और उस मूर्ति को वहां विचरण करने वाले चरवाहों ने निकाल कर एक गुफा में छिपा दिया लेकिन जब चरवाहे वापस लौट कर घर नहीं पहुंचे तब उनके घर वालों ने उन्हें ढूंढने के लिए कुछ और लोगों को भेजा तो उन्होंने चरवाहों को उस गुफा में मूर्ति के निकट बेहोश पाया जिसके बाद वहां पर देवी जी की मूर्ति स्थापित की गई और वह मंदिर आज भी नंदप्रयाग में चंडी मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

बद्रीनाथ धाम यात्रा, Badrinath Dham Yatra
बद्रीनाथ धाम यात्रा (Badrinath Dham Yatra)
नंदप्रयाग (Nandprayag) में देवी जी के मंदिर के अलावा भगवान कृष्ण का भी एक मंदिर है जो देखने लायक है। इसके अलावा यह जगह राजा दुष्यंत और शकुंतला से भी प्रेरित है उनके बारे में भी प्रमाण मिलते हैं। नंदप्रयाग से निकलने के बाद हमारा अगला पड़ाव था चमोली जो एक बहुत ही प्रसिद्ध जगह है यहां से आप केदारनाथ के लिए भी जा सकते हैं। चमोली ही वह स्थान है जहां से आप हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) और वैली ऑफ फ्लावर्स (Valley Of Flowes) फूलों की घाटी के लिए जा सकते हैं हालांकि हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) और वैली ऑफ फ्लावर्स (Valley Of Flowes) का सफर कुछ ही समय के लिए आम जनता के लिए खुलता है क्योंकि यहां पर काफी अच्छी बर्फबारी होती है अगर आप हेमकुंड साहिब (Hemkund Sahib) और वैली ऑफ फ्लावर्स (Valley Of Flowes) जाने का प्लान कर रहे हैं तो समय का अवश्य ध्यान दें और पहले से पता करें कि वहां जाने का रास्ता कब से खुल रहा है। चमोली (Chamoli) से निकलते निकलते हम लोगों को लगभग शाम के 7:00 बज चुके थे और यह समय पहाड़ों में सफर करने के लिए अनुकूल नहीं होता है इसीलिए हम लोगों ने अपना सफर बद्रीनाथ तक ना कर जोशीमठ (Joshimath) तक ही करना सही समझा और चमोली (Chamoli) से केवल 40 किलोमीटर दूर जोशीमठ (Joshimath) में अपना पड़ाव बनाया जोशीमठ (Joshimath) पहुंचते पहुंचते हम लोगों को लगभग 8:30 बज चुके थे काफी अंधेरा हो चुका था। अब हम लोगों का अगला चैलेंज था वहां पर रूम बुक करना। हम लोगों का प्लान इस बार कुछ एडवेंचर करने का था इसलिए पहले से कोई भी रूम बुक नहीं किया था हम लोगों ने पहले से ही सोचा हुआ था कि जहां हम लोग रुकेंगे वही खुद से जाकर रूम देखेंगे। वहां पर जाकर एक होटल बुक किया। आपको जोशीमठ (Joshimath) में 1000 से लेकर 1500 के बीच में आसानी से रूम मिल जाएगा। एक जरूरी बात आपको बताना चाहूंगा कि जोशीमठ (Joshimath) में रूम लेते समय ध्यान रखें कि आपको AC की कोई आवश्यकता नहीं है तो नॉन AC रूम ही ले क्योंकि वहां का मौसम काफी ठंडा रहता है। जोशीमठ (Joshimath) एक प्रसिद्ध स्थान है, जब बद्रीनाथ भगवान के बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) के पट सर्दियों में बंद होते हैं तो बद्रीनाथ भगवान को बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) से जोशीमठ (Joshimath) में लाया जाता है और जोशीमठ के नरसिंह भगवान मंदिर (Narsingh Temple) में बद्रीनाथ भगवान विराजमान होते हैं। अगर आप बद्रीनाथ जा रहे हैं तो जोशीमठ (Joshimath) में एक दिन जरूर रुकें क्योंकि वहां पर आपको देखने के लिए काफी अच्छे अच्छे मंदिर मिलेंगे जैसे नरसिंह भगवान का मंदिर उसके अलावा आदि गुरु शंकराचार्य जी का मठ जिसके नाम पर इस जगह का नाम जोशीमठ पड़ा है शुरू में इस मठ का नाम ज्योतिर मठ था लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ-साथ इस जगह का नाम ज्योतिर मठ से जोशीमठ हो गया इसके अलावा जोशीमठ के पास में एक और दर्शनीय स्थल है जहाँ आप सर्दियों के मौसम में छुट्टियां मनाने आसानी से आ सकते हैं इस जगह का नाम औली (Auli) है। जोशीमठ (Joshimath) से औली (Auli) आप कार से जा सकते हैं इसके अलावा रोपवे (Rope-Way) की व्यवस्था भी है और जो बहुत ही आसान किराए पर उपलब्ध है। औली (Auli) के बारे में काफी सुना हुआ था इसलिए हम ने भी इस जगह का आनंद उठाने का प्लान बनाया लेकिन अभी फिलहाल जैसा कि मैंने बताया रात के 09:00 बज चुके थे और हम लोगों को दिन भर की थकान के बाद बहुत नींद आ रही थी इसीलिए हम लोग सीधे अपने रूम में गए और वहां जाकर अपना सामान रख खाना खाया जो काफी अच्छा था। दिन भर की थकान के बाद कब हमें नींद आ गई पता ही नहीं चला।

यात्रा का तीसरा दिन (04 मई) ( जोशी मठ (Joshimath) से बद्रीनाथ (Badrinath Dham), बद्रीनाथ दर्शन, माना गांव  (Mana Gaon) और बद्रीनाथ से जोशीमठ )-

जब सुबह उठे तो 7:00 बज चुके थे और हम लोगों का प्लान था कि हम लोग जल्दी से जल्दी बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) पहुंचे और दर्शन करें इसलिए हम लोग बिना नहाए ही बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) के लिए निकल पड़े जोशीमठ (Joshimath) से बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) की दूरी केवल 45 किलोमीटर है सुबह का समय था दिन भी निकल आया था। हम लोग बद्रीनाथ धाम के लिए निकल पड़े, बद्रीनाथ धाम जाते समय हमारा पहला पड़ाव था विष्णुप्रयाग (Vishnuprayag)। विष्णुप्रयाग बद्रीनाथ धाम जाते समय पढ़ने वाले 5 प्रयागों में आखिरी और पांचवां प्रयाग है। विष्णुप्रयाग (Vishnuprayag) धौली गंगा (Dhauli Ganga) और अलकनंदा नदी (Alaknanda) के संगम पर बसा हुआ है यहां पर भगवान विष्णु का एक मंदिर है और एक विष्णु कुंड है जो देखने लायक है विष्णुप्रयाग (Vishnuprayag) के बाद हम लोग जल्दी से बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) पहुंचे। बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) पहुंचते पहुंचते लगभग 8:30 बज चुके थे वहां पहुंचकर हम लोगों ने चाय पी। सुबह का समय था बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) में उस रात भी बर्फबारी हुई थी इसकी वजह से वहां का तापमान लगभग शून्य के आसपास था, ठंडी हवा बह रही थी, हम लोगों ने काफी अच्छे से सर्दियों के गर्म कपड़े पहन रखे थे उसके बावजूद भी हमें ठंड का एहसास हो रहा था। चाय पीने के बाद थोड़ा सा शरीर में स्फूर्ति आई और हम लोगों ने बद्रीनाथ मंदिर की ओर प्रस्थान किया।

बद्रीनाथ धाम, Badrinath Dham
बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham)
बद्रीनाथ मंदिर (Badrinath Temple) अलकनंदा नदी (Alaknanda) के किनारे बना हुआ बहुत ही सुंदर और प्राचीन मंदिर है अलकनंदा नदी के दूसरे किनारे से देखने पर बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) की सुंदरता अलग ही दिखाई पड़ती है रंग बिरंगे फूलों से सजा हुआ बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) एक अलग ही छटा बिखेर रहा था बद्रीनाथ धाम में प्रवेश करने के लिए अलकनंदा नदी के ऊपर एक पुल बना हुआ है उस पुल को पार करते हुए हम लोग सीधे बद्रीनाथ मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुंचे।

बद्रीनाथ धाम, Badrinath Dham
बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham)
बद्रीनाथ धाम में नहाने के लिए तप्त कुंड (Hot Water Pond) है। तप्त कुंड का अर्थ गर्म पानी का कुआं या कुंड और यह बिल्कुल शाब्दिक प्रतीत होता है क्योंकि मंदिर के बिल्कुल नीचे ही अलकनंदा नदी के किनारे पर एक तप्त कुंड बना हुआ है जिसमें गर्म पानी आता है जो आपको इतनी सर्दी में एक अलग ही ताजगी देता है हम लोगों ने बारी-बारी तप्त कुंड में स्नान किया।

तप्त कुंड, Hot Water Pond
तप्त कुंड (Hot Water Pond)
कुंड में स्नान करने के बाद हम लोग पूजा सामग्री लेकर मंदिर के लिए आगे बढ़े। मंदिर में दर्शन के लिए बहुत ही सुंदर व्यवस्था है। श्रद्धालुओं की भीड़ में भगदड़ ना हो इसके लिए सुरक्षाकर्मियों की काफी अच्छी व्यवस्था है। इसके अलावा श्रद्धालुओं के लिए लाइन लगाना आवश्यक है साथ ही कंप्यूटराइज मशीनों द्वारा सभी श्रद्धालुओं को नंबर दिए जाते हैं जिससे कि कोई भी अपनी लाइन बीच में ना तोड़ सके। श्रद्धालुओं के खड़े होने के लिए टीन शेड की भी व्यवस्था है। हम लोग भी नंबर लेकर लाइन में लग गए। लगभग आधा किलोमीटर लंबी लाइन में लगकर हम लोगों को मंदिर के मुख्य भाग में लगभग 1 घंटे बाद प्रवेश मिला। मंदिर के अंदर का वातावरण बहुत ही रमणीक था।

बद्रीनाथ धाम, Badrinath Dham
बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham)
सभी श्रद्धालु बारी बारी से बद्रीनाथ भगवान के दर्शन कर रहे थे वहीं दूसरी ओर बद्रीनाथ धाम की रसोई में भगवान के लिए प्रसाद तैयार किया जा रहा था श्रद्धालुओं के लिए भी भगवान का प्रसाद दिया जा रहा था। मंदिर में हम लोगों ने काफी समय बिताया। मंदिर लकड़ी के बड़े-बड़े टुकड़ों पर बना हुआ बहुत ही सुंदर और अद्भुत वास्तुकार का नमूना है। लगभग 01 घंटा मंदिर के अंदर बिताने के बाद हम लोग मंदिर से बाहर निकले। बद्रीनाथ भगवान के दर्शन की अनुभूति ऐसी थी कि वह हमें बार-बार अंदर जाने के लिए मजबूर कर रही थी लेकिन जैसे जैसे दिन निकल रहा था वैसे वैसे दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लाइन लंबी होती जा रही थी। इसलिए हम लोग वहां से बाहर निकले और बाहर निकलने के बाद हम लोगों ने एक अच्छा सा नाश्ता किया क्योंकि हम लोगों ने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। नाश्ता करते समय हमें पता चला की बद्रीनाथ धाम से केवल 02 किलोमीटर की दूरी पर एक माना गांव है यह गांव भारत की सीमा का आखिरी गांव है। इसके साथ साथ इस गांव में महर्षि वेदव्यास का आश्रम, भीम शिला और गणेश गुफा है। इसलिए हम लोग उत्सुकता में माना गांव के लिए आगे बढ़े माना गांव पहुंचने के बाद हम लोग पैदल-पैदल भीम शिला की ओर आगे बढ़े।

भीम शिला, bhim pul, bhim shila
भीम शिला (Bhim Shila or Bhim Pul)
लगभग 2 से 3 किलोमीटर का पैदल सफर तय करने के बाद हम लोग भीम शिला पहुंचे। कहा जाता है कि महाभारत का युद्ध जीतने के बाद पांडव जब स्वर्ग की ओर जा रहे थे तो रास्ते में सरस्वती नदी पड़ी। पांडवों ने सरस्वती जी से रास्ता मांगा लेकिन जब सरस्वती जी ने रास्ता नहीं दिया तो भीम ने सरस्वती नदी के ऊपर एक बहुत बड़ा पत्थर रख दिया जो पुल की तरह काम करने लगा। इस पत्थर को भीम शिला कहा जाता है।

भीम शिला, Bhim Shila, Bhim Pul
भीम शिला (Bhim Shila or Bhim Pul)
इसके अलावा यहां पर पत्थरों पर पैरों की आकृति बनी हुई हैं कहा जाता है कि यह पैरों के निशान भीम के ही हैं।

भीम के पैरों के निशान
भीम के पैरों के निशान
इस पौराणिक महत्व को जानने के बाद हमारी उत्सुकता और बढ़ गई इसलिए हम लोग वहां से सीधे महर्षि वेदव्यास के आश्रम जिसे वेद गुफा भी कहते हैं कि और आगे बढ़े। महर्षि वेदव्यास की गुफा एक विशाल पत्थर के नीचे बनी हुई है। कहा जाता है कि यह पत्थर महर्षि वेदव्यास द्वारा लिखे गए ग्रंथ ही हैं इसीलिए इसको व्यास पोथी के नाम से भी जाना जाता है।

व्यास पोथी, Vyas pothi
व्यास पोथी (Vyas pothi)
कहते हैं कि जब महर्षि वेदव्यास और गणेश जी महाभारत लिख रहे थे तब महर्षि वेदव्यास ने यहीं से बैठकर भगवान गणेश को निर्देशित किया था।

गणेश मंदिर, Ganesh Temple
गणेश मंदिर (Ganesh Temple)
इसके अलावा गणेश गुफा भी यहीं से कुछ ही कदम की दूरी पर है। हम लोग अपने पौराणिक इतिहास को सजीव सा देख कर अचंभित थे। यहां घूमते घूमते हम लोगों को लगभग शाम के 5:00 बज चुके थे इसलिए हम लोग वापस अपने रूम पर जोशीमठ (Joshimath) के लिए निकल पड़े। आज का दिन बहुत ही आनंददायक था। रूम पर पहुंचने के बाद हम लोगों ने आराम किया और रात को खाना खाने के बाद फिर से सो गए।


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